बाला साहेब ठाकरे का जाना एक युग के अंत होने जैसा है...भारत ने पिछले कुछ समय में विभिन्न श्रेत्रों के कई महान व्यक्तियों को खो दिया है....यश चोपडा, राजेश खन्ना, केसी पंत, केसी सुदर्शन जैसे महान व्यक्तित्व जो अपने-अपने श्रेत्रों में महारथी थे...उनकी कमी से जो सूनापन आया है उसकी भरपायी अब शायद ही हो पाये...बाला साहेब की बात करें तो फर्श से अर्श का सफर तय करने के दौरान उन्हे अनेकों मुसीबतों का सामना करना पडा है...लेकिन ये बाला साहेब ही थे जो न कभी लडखडाये और न ही कभी डगमगाये...मराठी अस्मिता के लिये उनका संघर्ष उनकी आखिरी सांस तक जारी रहा...हालाकि उन्हे इस की कीमत भी चुकानी पडी...कई लोगो की नज़र में उनकी राह गलत थी तो कई लोगों के लिये वो अछूत थे....लेकिन मराठी लोगों के मन में उनके लिये असीम सम्मान और प्यार था...जो उनकी आखिरी यात्रा में साफ नज़र भी आया...बीस लाख से अधिक लोगों की भीड उस मुंबई में धीरे-धीरे रेंग रही थी जो एक रात पहले ही अनाथ हो चुकी थी..अपने बेबाक विचारों के लिये चर्चित बाला साहेब ने कभी भी पद की इच्छा नही की...वो किंग नही बने लेकिन उनकी भूमिका हमेशा किंग मेकर की रही...भले ही वो सरकार शिवसेना की हो या किसी और की...1966 से चला आ रहा उनका संघर्ष अनवरत जारी रहा....छगन भुजबल, संजय निरुपम और नारायण राणे के पार्टी छोडकर जाने का भी सेना पर कोई असर नही पडा क्योंकि शिवसैनिक के लिये आदेश सिर्फ बाला साहेब ही दे सकते थे....हालाकि राज ठाकरे का जाना उन्हे बहुत अखरा..बात सिर्फ अपने वोट बैंक को गंवाने का नही ता..ये बात थी मराठी एकता के खंडित होने की... बाला साहेब का डर बिल्कुल सही भी निकला...राज ठाकरे ने जो मराठी वोट बांटे उसी ने महाराष्ट्र में राकपा और कांग्रेस की सत्ता वापसी में अहम भूमिका निभाई...बाला साहेब के जाने के बाद ये चर्चा तेज हो गयी है कि उनकी इस विरासत को कौन संभालेगा...उद्धव ठाकरे या राज ठाकरे...उद्धव ठाकरे में बाला साहेब ठाकरे जैसा व्यक्तित्व नज़र नही आता लेकिन सेना की कमान उनके हाथ में है...वहीं राज ठाकरे अपने ताउ के कार्बन कॉपी तो हैं लेकिन सेना में नही...अब ये भी सवाल है कि जो काम बाला साहेब जीते जीते नही कर सके...वो क्या उनके मरने के बाद हो सकेगा....क्या दोनो ठाकरे अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षा और अभिमान को भुलाकर मराठी लोगों के लिये एकजुट होंगे...इसका जवाब तो आने वाले दिनो में साफ हो जायेगा...लेकिन ये भी तय है कि चाहे वो मनसे हो या सेना दोनो ही बाला साहेब के ही बताये रास्ते पर ही कदम बढायेंगे...मराठी लोगों का ये भी मानना है कि अगर ये दोनो एक बार फिर से एक जुट होते हैं तो यही बाला साहेब के लिये सच्ची श्रद्धान्जलि होगी...पार्टियां आगे भी बनेंगी और उनसे नेता भी निकलेंगे...लेकिन इनमें से कोई बाला साहेब जैसा व्यक्तित्व बना पायेगा इसमें संदेह ही है...बाला साहेब के जाने से महाराष्ट्र और देश की राजनीति में शुन्य उत्पन्न हुआ है उसकी भरपायी अब नही हो सकती...
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