Saturday, 8 October 2011

विचारों की आजादी

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है...हालाकि इसके दायरे निर्धारित हैं..लेकिन इस दायरे में रहते हुये लोग अपने विचारों को व्यक्त करते हैं...चाहे उनकी बात तार्किक हो या अतार्कित उनके लिये ये बडा विषय नही है...क्योंकि आखिर में उनका कथन होता है कि ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं..हालाकि अपने व्यक्तिगत विचारों को राष्ट्रीय विचार की संज्ञा देने में भी लोग पीछे नही रहते...मेरे एक पत्रकार मित्र हैं...जो मानते हैं कि उनकी सोच आम आदमी की सोच से जुदा है..वो खुद को सेक्युलर मानते हैं...अपनी विचारधारा को सर्वोपरि..मानने में भी वो पीछे नही रहते और समाज की गतिविधियों से काफी चिन्तित दिखाई पडते हैं....खास तौर पर गुजरात और साध्वी प्रज्ञा के बारे में उनकी चिन्ता तो काफी गंभीर होती है...
.वैसे उनके पास अपने विचारों की प्रमाणिकता को साबित करने का तथ्य नही होता है लेकिन ये भारत है और यहां सबको अपने विचार व्यक्त करने की अभिव्यक्ति है...इसी क्रम में उनसे मेरी बात हुयी मौजूदा यूपीए सरकार के कार्यकाल को लेकर और मैने उनसे कुछ जवाब जानने चाहे...हालाकि वो खुद को गैर राजनितिक व्यक्ति बताते हैं..लेकिन उनके जवाबों को सुनने के बात इस बात का प्रमाण मिल जाता है कि वो कितने गैरराजनितिक हैं...मैने उनसे सवाल किया कि इस सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार का जिम्मेदार कौन है तो उन्होने बडे विश्वास के साथ इसका जवाब देते हुये कहा कि भ्रष्टाचार के लिये कांग्रेस शासित यूपीए नही बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी जिम्मेदार है क्योंकि भ्रष्टाचार की शुरुआत वहीं से हुयी है...उनके इस जवाब ने मेरे दिमाग के सारे पूर्जे हिला दिये लेकिन उनकी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का सम्मान करते हुये मैने उनसे अगला सवाल पूछ लिया..कि वो मंहगाई के लिये किसे जिम्मेदार मानते हैं...उनका जवाब था कि एक दो नातियों को छोडकर विदेशी वजहें भारत में मंहगाई बढने की वजह हैं..अगला सवाल पिछले साल सालों में आये घोटालों को लेकर था...मेरे पत्रकार मित्र ने जवाब दिया कि सहयोगी पार्टियों के साथ कांग्रेस की जिम्मेदारी है...फिर मेरी बात वर्तमान की कमजोर सरकार को लेकर हुयी तो उन्होने सीधे इसबात को नकार दिया कि सरकार कमजोर हैं उनकी माने तो ये सवाल ही पूर्णतया गलत है..सवालो का सिलसिला केन्द्रिय सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर पहुचां...जहां वो कहते हैं कि सत्ता के दो ध्रुव नही हैं और सरकार मनमोहन सिंह की ही मर्जी से चल रही है..लेकिन वो साथ में ये भी जोडना नही भूलते हैं कि बदलाव जरुरी है..हालाकि विद्वान मित्र ये नही बता सके कि वो किस बदलाव की बात कर रहे हैं...मौजूदा सरकार की तेजी से गिरती विश्वसनीयता के बारे में वो कहते हैं कि ये सब विपक्षी पार्टियों का भ्रामक प्रचार है जो देश में विकास नही होने देना चाह रहीं...सीबीआई के इस्तेमाल को भी वो गलत नही मानते और कहते हैं कि सारी सरकारें ऐसा करती है...सीवीसी की गलत न्युक्ति के मामले वो जरुर कांग्रेस को जिम्मेदार मानने के लिये तैयार हो गये...फिर हमारी बात हुयी भारतीय विदेश नीति को लेकर...तो उन्होने मनमोहन सरकार की सराहना करते हुये कहा कि आज भारत के हालात विदेश में काफी बेहतर हैं ...बातों का सिलसिला यूपीए सरकार की गिरती विश्वशनीयता को लेकर हुयी...तो उन्होने कहा कि वास्तविक स्थिति ऐसी नही है ये सब एनडीए 2014 में होने वाले चुनावों के लिये जनता को बरगला रहा है..उनकी माने तो जनता महंगाई से तो जरुर परेशान है लेकिन लाइफ स्टाइल ,टेक्नलॉजी,विकास और शिक्षा व्यवस्था से पूरी तरह खुश है.वोट फॉर कैश मामले में भी उनके विचार दिलचस्प हैं....वो कहते हैं कि ये सब नाटक बीजेपी का किया था सरकार को बदमान करने के लिये..मेरे मन में तब सवाल आया कि मैं उनसे पूछूं कि क्रास वोटिंग करने वाले 18 सांसद अगले चुनाव में पंजा लेकर चुनाव में कैसे आ गये लेकिन उनके विचारों की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुये मैने अपने आप को रोक लिया...आखिर में मैने उनसे जानना चाहा कि क्या सरकार घोटालों को दबाने के लिये जिम्मेदार है तो उनका जवाब हां में था...इतनी लंबी बात चीत के दौरान उन्हे शायद अंदाजा हो गया कि उनकी बातों को शायद मैं कलमबद्ध करुं तो वो अचानक सतर्क हो गये...और कहा कि उनके ये विचार पूरी तरह सही मनोदशा में नही दिये गये हैं...मैं हतप्रभ था कि थोडी देर पहले तक जोर शोर से आत्मविश्वास के साथ सवालों के जवाब दे रहे पत्रकार महोदय को अचानक क्या हो गया..इसके बाद उन्होने मुझसे जो कहा मै उसे भी उनके शब्दों में यहां लिख रहा हूं........अगर मैं सच्चा हिन्दुस्तानी हूं को कांग्रेस को इसी समय सरकार से बेदखल कर देना चाहिये..चूकि देश में इसके बाद दूसरी राष्ट्रीय पार्टी भाजपा है तो उसे एक मौका दिया जाना चाहिये..इस बात का इंतजार रहेगा कि  जनता बीजेपी को सत्ता में ला रही है तो ये पार्टी भी कांग्रेस की तरह उन कर्मों को न दोहराये.....
इस बातचीत के खत्म होने के बाद मैं बडी देर तक सोच में पडा रहा है कि विचारों में इतना परिवर्तन सिर्फ कुछ मिनटों में...कैसे संभव है...लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ख्याल आते ही मुझे इसका जवाब मिल गया...कि यहां तर्क और तथ्य की नही बल्कि विचारों को व्यक्त करने आजादी है भले ही वो विचार बिना सर ,पैर के हों...अपने इस पत्रकार मित्र के जीवन पर बडे बडे ,नामी पत्रकारों का प्रभाव है जिनका जिक्र आने वाले समय पर जरुर करुंगा..लेकिन ये जरुर है कि इन महानुभाव से बात करके ही मुझे पहली बार अभिव्यक्ति की सवतंत्रता का वास्तविक मतलब समझ में आ गया......