गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सदभावना उपवास की घोषणा ने एक
नया विषय मीडिया के सामने पेश कर दिया है...कि क्या मोदी के इस उपवास के
मूल में प्रधानमंत्री का पद तो नही है.. मोदी के उपवास के खत्म होने के बाद
भी ये बहस अब काफी दिनो तक चलती रहेगी या यूं कहें कि 2014 लोक सभा चुनावों तक ये विषय मीडिया को रिझाता रहेगा..जाहिर सी बात बात है कि आज
भारत में मीडिया इतना सशक्त हो चुका है कि वो किसी के चरित्र को बना भी
सकता है और बिगाड भी सकता है...शायद इस बात मे किसी को संदेह नही होगा कि
अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता में मीडिया का रोल काफी अहम रहा था...जितना
सत्य ये है कि भारत के हर वर्ग का समर्थन अन्ना हजारे को मिला
..उतना ही सत्य ये भी है कि अगर मीडिया सक्रिय नही होती तो शायद ये आंदोलन
इतना सफल नही हो सकता था...ये सत्य है कि मोदी के उपवास का समय एक सवाल बन
कर सबके जेहन में घूम रहा है कि आखिर मोदी ने इस सदभावना मिशन के लिये ये
समय क्यों चुना...लेकिन इसे समझने के लिये हमें थोडा पीछे जाने की जरुरत
है...केन्द्र सरकार के द्वारा किये गये घोटालो के लगातार सामने आने से
भारतीय जनता में आक्रोश जन्म ले चुका था जो अन्ना हजारे के आंदोलन में अपने
चरम पर पहुच गया...भ्रष्टाचार के खिलाफ खडी हो चुकी जनता को अपने कार्यों
का लेखा जोखा देने के लिये मोदी के पास इससे अच्छा समय नही था... रही सही
कसर अमेरिकी रिपोर्ट ने पूरी कर दी जिसमें मोदी को बीजेपी की तरफ से
प्रधानमंत्री पद के सबसे बडे दावेदार के रुप में पेश किया गया था..मोदी के
समापन भाषण में भी उन्होने इसका जिक्र किया है....गुजरात के मुख्यमंत्री ने
साफ कहा कि उनके द्वारा कराये गये विकास के कार्यों को अभी भी विपक्ष
लगातार नकारता जा रहा था..जिसे सामने लाने के लिये एक ऐसे विराट कार्यक्रम
की जरुरत थी जो विपक्षियों के कुप्रचार को झुठलाते हुये सत्य को देश के
सामने ले आये..हालाकि मोदी के अनशन के लिये सिर्फ अन्ना द्वारा बनाया गया
माहौल ही काफी नही था...पिछले कुछ दिनों में कई चीजें ऐसी हुयी जो मोदी के
पक्ष में गयीं..सुप्रीम कोर्ट का मोदी के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज कराने का आदेश
नही देना और मुकदमें को गुजरात की निचली अदालत में वापस भेज देना...इस केस
की निगरानी करने से इनकार कर देना.और एसआईटी के रिपोर्ट को आधार बनाकर
फैसला सुनाना ये सारी बाते मोदी के लिये राहत देने वाली थीं...ये सत्य है
कि गुजरात दंगों को लेकर मोदी के उपर कोई केस नही है..मोदी को डर तब हो
सकता था जब सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दे
देता...लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ और मोदी पहले से सशक्त हो कर सामने आ
गये..कुछ बुद्धिजीवियों ने उनके अनशन को बीजेपी में प्रधानमंत्री पद को
लेकर चल रहे अंतरकहल का परिणाम बताया..और कहा कि इस सदभावना मिशन के नाम पर
मोदी अपनी दावेदारी की लाइन को दूसरे बीजेपी नेताओं से आगे बढाने का काम
कर रहे हैं..ये सही है कि मोदी के इस विराट शक्ति प्रदर्शन ने उनकी
दावेदारी को काफी मजबूत कर दिया है...लेकिन उनके बढते कद ने बीजेपी से
ज्यादा कांग्रेस को परेशान कर दिया है...अपने युवराज की ताजपोशी में जुडे
कांग्रेसियों के लिये ये तगडा झटका है...जिस तरह कांग्रसियों ने राहुल
गांधी को भविष्य के प्रधानमंत्री के रुप में पेश किया और उन्हे एक
जिम्मेदार राजनेता की छवि प्रदान करने की कोशिश की जो गरीबों के ये यहां
रात बिताता था उनके दुख सुख में शामिल होता था...लेकिन पिछले कुछ दिनों में
उनके अपरिपक्व बयानों ने और सोनिय़ा की गैरमौजूदगी में अन्ना के आंदोलन को
सही ढंग से नियंत्रित नही कर पाने की असफलता ने उन्हे काफी पीछे कर
दिया..इन वजहों ने तेजी से बन रही राहुल गांधी की छवि को काफी नुकसान पहुचा
दिया..साथ ही बढती मंहगाई और यूपीए सरकार में सामने आ रहे लगातार घोटालों
पर चुप्पी ने भी राहुल की छवि पर विपरीत प्रभाव डाला ...क्यों कि
कांग्रेसियों के राहुल चलीसा ने देश की जनता के मन में ये विश्वास पैदा कर
दिया था कि राहुल अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर उन्हे राहत दिलायेगें..बहरहाल
ऐसा कुछ नही हुआ और प्रधानमंत्री की दौड में मोदी की लकीर आडवानी ,सुषमा
स्वराज और जेटली के साथ राहुल गांधी से भी काफी आगे निकल गयी....गुजरात के
विकास को सिर्फ सतही मानने वालों को एक और करारा जवाब सयुंक्त राष्ट्र संघ
की रिपोर्ट से मिली..जिसने गुजरात के कृषि विकास को भारत में सबसे आगे
माना..ये उन लोगों के लिये जवाब था जो गुजरात की तरक्की को सिर्फ औद्योगिक
विकास मान रहे थे... संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट गुजरात को देश के
बाकी राज्यों से आगे नही पहुचा दिया जहां भारत की 70 फीसदी आबादी गांवों
में निवास करती है और उनके जीवन यापन का दारोमदार कृषि पर टिका हुआ है...
इस सदभावना मिशन ने मोदी की उस छवि को भी काफी विस्तार दिया..जिसको लेकर
विरोधी हमेशा सवाल उठाते रहे...वो मानते थे कि देश के दूसरे राजनितिक दलों
में मोदी के लिये स्वीकार्यता नही है...लेकिन मंच पर अन्ना द्रमुक और मनसे
की मौजूदगी ने एनडीए विस्तार की तरफ एक इशारा कर दिया..गौरतलब है कि इसी
अन्ना द्रमुक के समर्थन वापसी से 1998 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार महज
1 वोट से गिर गयी थी और मनसे के विरोध से पिछले लोक सभा और विधान सभा
चुनावों में भाजपा शिवसेना को काफी नुकसान उठाना पडा था..हालाकि मोदी के
मंच से जनता दल युनाईटेड की गैर नुमाइंदगी का भी सवाल आया...जेडीयू एक
श्रेत्रीय पार्टी है और उसका अपना ही जनाधार है...और वो गुजरात में एनडीए
का घटक भी नही है ऐसे में उनके न आने को इतनी गंभीरता से लेना सही नही
है..क्योंकि ये सत्य भी सर्वविदित है कि जेडीयू ,बीजेपी का गठबंधन काफी
पुराना है और ये दल 2002 में भी केन्द्र सरकार में शामिल था ..गुजरात दंगों
के बाद भी उसने अपना समर्थन वापस नही लिया था...ये सभी जानते है कि ये
सदभावना मिशन बीजेपी का नही बल्कि गुजरात सरकार का कार्यक्रम था...जहां
बीजेपी के सहयोगी दलों की मौजूदगी या गैरमौजूदगी कोई विषय ही नही
था...लेकिन यहां मोदी ने जेडीयू को छोडकर एनडीए और उसके बाहर के कई दलों का
समर्थन हासिल कर अपनी स्वीकार्यता पर मोहर लगा दी ..2002 के गुजरात दंगों
को लेकर मोदी पर जितने आरोप लगे उन्होने उन सभी आरोपों का जवाब गुजरात का
विकास करके दे दिया..आज देश की जनता भी अपने अपने राज्यों में गुजरात जैसा
विकास देखना चाहती..केन्द्र में एक ऐसे नेता को देखना चाहती है जो विकास के
प्रति समर्पित रहे..और उनके इस फ्रेम में नरेन्द्र मोदी से बेहतर कोई
तस्वीर नही दिखती..लिहाजा माना जा सकता है कि मोदी का सदभावना मिशन अपने हर
मोर्च में बेहद सफल रहा ...और उसने मोदी को न सिर्फ बीजेपी में बल्कि
दूसरे दलों के नेताओं से भी काफी आगे खडा कर दिया है..चलते चलते मोदी के उस
लाइन का जिक्र कर देता हूं जो आज देश की जनता के मन में भी है कि आज वोट
बैंक की राजनीति नही विकास चाहिये...पेट भर रोटी चाहिये...
प्रभात पांडेय
prabhat2412@gmail.com
प्रभात पांडेय
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