Sunday, 18 November 2012

bala saheb ko naman

बाला साहेब ठाकरे का जाना एक युग के अंत होने जैसा है...भारत ने पिछले कुछ समय में विभिन्न श्रेत्रों के कई महान व्यक्तियों को खो दिया है....यश चोपडा, राजेश खन्ना, केसी पंत, केसी सुदर्शन जैसे महान व्यक्तित्व जो अपने-अपने श्रेत्रों में महारथी थे...उनकी कमी से जो सूनापन आया है उसकी भरपायी अब शायद ही हो पाये...बाला साहेब की बात करें तो फर्श से अर्श का सफर तय करने के दौरान उन्हे अनेकों मुसीबतों का सामना करना पडा है...लेकिन ये बाला साहेब ही थे जो न कभी लडखडाये और न ही कभी डगमगाये...मराठी अस्मिता के लिये उनका संघर्ष उनकी आखिरी सांस तक जारी रहा...हालाकि उन्हे इस की कीमत भी चुकानी पडी...कई लोगो की नज़र में उनकी राह गलत थी तो कई लोगों के लिये वो अछूत थे....लेकिन मराठी लोगों के मन में उनके लिये असीम सम्मान और प्यार था...जो उनकी आखिरी यात्रा में साफ नज़र भी आया...बीस लाख से अधिक लोगों की भीड उस मुंबई में धीरे-धीरे रेंग रही थी जो एक रात पहले ही अनाथ हो चुकी थी..अपने बेबाक विचारों के लिये चर्चित बाला साहेब ने कभी भी पद की इच्छा नही की...वो किंग नही बने लेकिन उनकी भूमिका हमेशा किंग मेकर की रही...भले ही वो सरकार शिवसेना की हो या किसी और की...1966 से चला आ रहा उनका संघर्ष अनवरत जारी रहा....छगन भुजबल, संजय निरुपम और नारायण राणे के पार्टी छोडकर जाने का भी सेना पर कोई असर नही पडा क्योंकि शिवसैनिक के लिये आदेश सिर्फ बाला साहेब ही दे सकते थे....हालाकि राज ठाकरे का जाना उन्हे बहुत अखरा..बात सिर्फ अपने वोट बैंक को गंवाने का नही ता..ये बात थी मराठी एकता के खंडित होने की... बाला साहेब का डर बिल्कुल सही भी निकला...राज ठाकरे ने जो मराठी वोट बांटे उसी ने महाराष्ट्र में राकपा और कांग्रेस की सत्ता वापसी में अहम भूमिका निभाई...बाला साहेब के जाने के बाद ये चर्चा तेज हो गयी है कि उनकी इस विरासत को कौन संभालेगा...उद्धव ठाकरे या राज ठाकरे...उद्धव ठाकरे में बाला साहेब ठाकरे जैसा व्यक्तित्व नज़र नही आता लेकिन सेना की कमान उनके हाथ में है...वहीं राज ठाकरे अपने ताउ के कार्बन कॉपी तो हैं लेकिन सेना में नही...अब ये भी सवाल है कि जो काम बाला साहेब जीते जीते नही कर सके...वो क्या उनके मरने के बाद हो सकेगा....क्या दोनो ठाकरे अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षा और अभिमान को भुलाकर मराठी लोगों के लिये एकजुट होंगे...इसका जवाब तो आने वाले दिनो में साफ हो जायेगा...लेकिन ये भी तय है कि चाहे वो मनसे हो या सेना दोनो ही बाला साहेब के ही बताये रास्ते पर ही कदम बढायेंगे...मराठी लोगों का ये भी मानना है कि अगर ये दोनो एक बार फिर से एक जुट होते हैं तो यही बाला साहेब के लिये सच्ची श्रद्धान्जलि होगी...पार्टियां आगे भी बनेंगी और उनसे नेता भी निकलेंगे...लेकिन इनमें से कोई बाला साहेब जैसा व्यक्तित्व बना पायेगा इसमें संदेह ही है...बाला साहेब के जाने से महाराष्ट्र और देश की राजनीति में शुन्य उत्पन्न हुआ है उसकी भरपायी अब नही हो सकती...

Saturday, 8 October 2011

विचारों की आजादी

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है...हालाकि इसके दायरे निर्धारित हैं..लेकिन इस दायरे में रहते हुये लोग अपने विचारों को व्यक्त करते हैं...चाहे उनकी बात तार्किक हो या अतार्कित उनके लिये ये बडा विषय नही है...क्योंकि आखिर में उनका कथन होता है कि ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं..हालाकि अपने व्यक्तिगत विचारों को राष्ट्रीय विचार की संज्ञा देने में भी लोग पीछे नही रहते...मेरे एक पत्रकार मित्र हैं...जो मानते हैं कि उनकी सोच आम आदमी की सोच से जुदा है..वो खुद को सेक्युलर मानते हैं...अपनी विचारधारा को सर्वोपरि..मानने में भी वो पीछे नही रहते और समाज की गतिविधियों से काफी चिन्तित दिखाई पडते हैं....खास तौर पर गुजरात और साध्वी प्रज्ञा के बारे में उनकी चिन्ता तो काफी गंभीर होती है...
.वैसे उनके पास अपने विचारों की प्रमाणिकता को साबित करने का तथ्य नही होता है लेकिन ये भारत है और यहां सबको अपने विचार व्यक्त करने की अभिव्यक्ति है...इसी क्रम में उनसे मेरी बात हुयी मौजूदा यूपीए सरकार के कार्यकाल को लेकर और मैने उनसे कुछ जवाब जानने चाहे...हालाकि वो खुद को गैर राजनितिक व्यक्ति बताते हैं..लेकिन उनके जवाबों को सुनने के बात इस बात का प्रमाण मिल जाता है कि वो कितने गैरराजनितिक हैं...मैने उनसे सवाल किया कि इस सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार का जिम्मेदार कौन है तो उन्होने बडे विश्वास के साथ इसका जवाब देते हुये कहा कि भ्रष्टाचार के लिये कांग्रेस शासित यूपीए नही बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी जिम्मेदार है क्योंकि भ्रष्टाचार की शुरुआत वहीं से हुयी है...उनके इस जवाब ने मेरे दिमाग के सारे पूर्जे हिला दिये लेकिन उनकी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का सम्मान करते हुये मैने उनसे अगला सवाल पूछ लिया..कि वो मंहगाई के लिये किसे जिम्मेदार मानते हैं...उनका जवाब था कि एक दो नातियों को छोडकर विदेशी वजहें भारत में मंहगाई बढने की वजह हैं..अगला सवाल पिछले साल सालों में आये घोटालों को लेकर था...मेरे पत्रकार मित्र ने जवाब दिया कि सहयोगी पार्टियों के साथ कांग्रेस की जिम्मेदारी है...फिर मेरी बात वर्तमान की कमजोर सरकार को लेकर हुयी तो उन्होने सीधे इसबात को नकार दिया कि सरकार कमजोर हैं उनकी माने तो ये सवाल ही पूर्णतया गलत है..सवालो का सिलसिला केन्द्रिय सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर पहुचां...जहां वो कहते हैं कि सत्ता के दो ध्रुव नही हैं और सरकार मनमोहन सिंह की ही मर्जी से चल रही है..लेकिन वो साथ में ये भी जोडना नही भूलते हैं कि बदलाव जरुरी है..हालाकि विद्वान मित्र ये नही बता सके कि वो किस बदलाव की बात कर रहे हैं...मौजूदा सरकार की तेजी से गिरती विश्वसनीयता के बारे में वो कहते हैं कि ये सब विपक्षी पार्टियों का भ्रामक प्रचार है जो देश में विकास नही होने देना चाह रहीं...सीबीआई के इस्तेमाल को भी वो गलत नही मानते और कहते हैं कि सारी सरकारें ऐसा करती है...सीवीसी की गलत न्युक्ति के मामले वो जरुर कांग्रेस को जिम्मेदार मानने के लिये तैयार हो गये...फिर हमारी बात हुयी भारतीय विदेश नीति को लेकर...तो उन्होने मनमोहन सरकार की सराहना करते हुये कहा कि आज भारत के हालात विदेश में काफी बेहतर हैं ...बातों का सिलसिला यूपीए सरकार की गिरती विश्वशनीयता को लेकर हुयी...तो उन्होने कहा कि वास्तविक स्थिति ऐसी नही है ये सब एनडीए 2014 में होने वाले चुनावों के लिये जनता को बरगला रहा है..उनकी माने तो जनता महंगाई से तो जरुर परेशान है लेकिन लाइफ स्टाइल ,टेक्नलॉजी,विकास और शिक्षा व्यवस्था से पूरी तरह खुश है.वोट फॉर कैश मामले में भी उनके विचार दिलचस्प हैं....वो कहते हैं कि ये सब नाटक बीजेपी का किया था सरकार को बदमान करने के लिये..मेरे मन में तब सवाल आया कि मैं उनसे पूछूं कि क्रास वोटिंग करने वाले 18 सांसद अगले चुनाव में पंजा लेकर चुनाव में कैसे आ गये लेकिन उनके विचारों की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुये मैने अपने आप को रोक लिया...आखिर में मैने उनसे जानना चाहा कि क्या सरकार घोटालों को दबाने के लिये जिम्मेदार है तो उनका जवाब हां में था...इतनी लंबी बात चीत के दौरान उन्हे शायद अंदाजा हो गया कि उनकी बातों को शायद मैं कलमबद्ध करुं तो वो अचानक सतर्क हो गये...और कहा कि उनके ये विचार पूरी तरह सही मनोदशा में नही दिये गये हैं...मैं हतप्रभ था कि थोडी देर पहले तक जोर शोर से आत्मविश्वास के साथ सवालों के जवाब दे रहे पत्रकार महोदय को अचानक क्या हो गया..इसके बाद उन्होने मुझसे जो कहा मै उसे भी उनके शब्दों में यहां लिख रहा हूं........अगर मैं सच्चा हिन्दुस्तानी हूं को कांग्रेस को इसी समय सरकार से बेदखल कर देना चाहिये..चूकि देश में इसके बाद दूसरी राष्ट्रीय पार्टी भाजपा है तो उसे एक मौका दिया जाना चाहिये..इस बात का इंतजार रहेगा कि  जनता बीजेपी को सत्ता में ला रही है तो ये पार्टी भी कांग्रेस की तरह उन कर्मों को न दोहराये.....
इस बातचीत के खत्म होने के बाद मैं बडी देर तक सोच में पडा रहा है कि विचारों में इतना परिवर्तन सिर्फ कुछ मिनटों में...कैसे संभव है...लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ख्याल आते ही मुझे इसका जवाब मिल गया...कि यहां तर्क और तथ्य की नही बल्कि विचारों को व्यक्त करने आजादी है भले ही वो विचार बिना सर ,पैर के हों...अपने इस पत्रकार मित्र के जीवन पर बडे बडे ,नामी पत्रकारों का प्रभाव है जिनका जिक्र आने वाले समय पर जरुर करुंगा..लेकिन ये जरुर है कि इन महानुभाव से बात करके ही मुझे पहली बार अभिव्यक्ति की सवतंत्रता का वास्तविक मतलब समझ में आ गया......

Monday, 19 September 2011

Modi Ka Fast

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सदभावना उपवास की घोषणा ने एक नया विषय मीडिया के सामने पेश कर दिया है...कि क्या मोदी के इस उपवास के मूल में प्रधानमंत्री का पद तो नही है.. मोदी के उपवास के खत्म होने के बाद भी ये बहस अब काफी दिनो तक चलती रहेगी या यूं कहें कि 2014 लोक सभा चुनावों तक ये विषय मीडिया को रिझाता रहेगा..जाहिर सी बात बात है कि आज भारत में मीडिया  इतना सशक्त हो चुका है कि वो किसी के चरित्र को बना भी सकता है और बिगाड भी सकता है...शायद इस बात मे किसी को संदेह नही होगा कि अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता में मीडिया का रोल काफी अहम रहा था...जितना सत्य ये है कि  भारत के हर वर्ग का समर्थन अन्ना हजारे को मिला ..उतना ही सत्य ये भी है कि अगर मीडिया सक्रिय नही होती तो शायद ये आंदोलन इतना सफल नही हो सकता था...ये सत्य है कि मोदी के उपवास का समय एक सवाल बन कर सबके जेहन में घूम रहा है कि आखिर मोदी ने इस सदभावना मिशन के लिये ये समय क्यों चुना...लेकिन इसे समझने के लिये हमें थोडा पीछे जाने की जरुरत है...केन्द्र सरकार के द्वारा किये गये घोटालो के लगातार सामने आने से भारतीय जनता में आक्रोश जन्म ले चुका था जो अन्ना हजारे के आंदोलन में अपने चरम पर पहुच गया...भ्रष्टाचार के खिलाफ खडी हो चुकी जनता को अपने कार्यों का लेखा जोखा देने के लिये मोदी के पास इससे अच्छा समय नही था... रही सही कसर अमेरिकी रिपोर्ट ने पूरी कर दी जिसमें मोदी को बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के सबसे बडे दावेदार के रुप में पेश किया गया था..मोदी के समापन भाषण में भी उन्होने इसका जिक्र किया है....गुजरात के मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि उनके द्वारा कराये गये विकास के कार्यों को अभी भी विपक्ष लगातार नकारता जा रहा था..जिसे सामने लाने के लिये एक ऐसे विराट कार्यक्रम की जरुरत थी जो विपक्षियों के कुप्रचार को झुठलाते हुये सत्य को देश के सामने ले आये..हालाकि मोदी के अनशन के लिये सिर्फ अन्ना द्वारा बनाया गया माहौल ही काफी नही था...पिछले कुछ दिनों में कई चीजें ऐसी हुयी जो मोदी के पक्ष में गयीं..सुप्रीम कोर्ट का मोदी के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज कराने का आदेश नही देना और मुकदमें को गुजरात की निचली अदालत में वापस भेज देना...इस केस की निगरानी करने से इनकार कर देना.और एसआईटी के रिपोर्ट को आधार बनाकर फैसला सुनाना ये सारी बाते मोदी के लिये राहत देने वाली थीं...ये सत्य है कि गुजरात दंगों को लेकर मोदी के उपर कोई केस नही है..मोदी को डर तब हो सकता था जब सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दे देता...लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ और मोदी पहले से सशक्त हो कर सामने आ गये..कुछ बुद्धिजीवियों ने उनके अनशन को बीजेपी में प्रधानमंत्री पद को लेकर चल रहे अंतरकहल का परिणाम बताया..और कहा कि इस सदभावना मिशन के नाम पर मोदी अपनी दावेदारी की लाइन को दूसरे बीजेपी नेताओं से आगे बढाने का काम कर रहे हैं..ये सही है कि मोदी के इस विराट शक्ति प्रदर्शन ने उनकी दावेदारी को काफी मजबूत कर दिया है...लेकिन उनके बढते कद ने बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस को परेशान कर दिया है...अपने युवराज की ताजपोशी में जुडे कांग्रेसियों के लिये ये तगडा झटका है...जिस तरह कांग्रसियों ने राहुल गांधी को भविष्य के प्रधानमंत्री के रुप में पेश किया और उन्हे एक जिम्मेदार राजनेता की छवि प्रदान करने की कोशिश की जो गरीबों के ये यहां रात बिताता था उनके दुख सुख में शामिल होता था...लेकिन पिछले कुछ दिनों में उनके अपरिपक्व बयानों ने और सोनिय़ा की गैरमौजूदगी में अन्ना के आंदोलन को सही ढंग से नियंत्रित नही कर पाने की असफलता ने उन्हे काफी पीछे कर दिया..इन वजहों ने तेजी से बन रही राहुल गांधी की छवि को काफी नुकसान पहुचा दिया..साथ ही बढती मंहगाई और यूपीए सरकार में सामने आ रहे लगातार घोटालों पर चुप्पी ने भी राहुल की छवि पर विपरीत प्रभाव डाला ...क्यों कि कांग्रेसियों के राहुल चलीसा ने देश की जनता के मन में ये विश्वास पैदा कर दिया था कि राहुल अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर उन्हे राहत दिलायेगें..बहरहाल ऐसा कुछ नही हुआ और प्रधानमंत्री की दौड में मोदी की लकीर आडवानी ,सुषमा स्वराज और जेटली के साथ राहुल गांधी से भी काफी आगे निकल गयी....गुजरात के विकास को सिर्फ सतही मानने वालों को  एक और करारा जवाब सयुंक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट से मिली..जिसने गुजरात के कृषि विकास को भारत में सबसे आगे माना..ये उन लोगों के लिये जवाब था जो गुजरात की तरक्की को सिर्फ औद्योगिक विकास मान रहे थे... संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट गुजरात को देश के बाकी राज्यों से आगे नही पहुचा दिया जहां भारत की 70 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है और उनके जीवन यापन का दारोमदार कृषि पर टिका हुआ है... इस सदभावना मिशन ने मोदी की उस छवि को भी काफी विस्तार दिया..जिसको लेकर विरोधी हमेशा सवाल उठाते रहे...वो मानते थे कि देश के दूसरे राजनितिक दलों में मोदी के लिये स्वीकार्यता नही है...लेकिन मंच पर अन्ना द्रमुक और मनसे की मौजूदगी ने एनडीए विस्तार की तरफ एक इशारा कर दिया..गौरतलब है कि इसी अन्ना द्रमुक के समर्थन वापसी से 1998 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार महज 1 वोट से गिर गयी थी और मनसे के विरोध से पिछले लोक सभा और विधान सभा चुनावों में भाजपा शिवसेना को काफी नुकसान उठाना पडा था..हालाकि मोदी के मंच से जनता दल युनाईटेड की गैर नुमाइंदगी का भी सवाल आया...जेडीयू एक श्रेत्रीय पार्टी है और उसका अपना ही जनाधार है...और वो गुजरात में एनडीए का घटक भी नही है ऐसे में उनके न आने को इतनी गंभीरता से लेना सही नही है..क्योंकि ये सत्य भी सर्वविदित है कि जेडीयू ,बीजेपी का गठबंधन काफी पुराना है और ये दल 2002 में भी केन्द्र सरकार में शामिल था ..गुजरात दंगों के बाद भी उसने अपना समर्थन वापस नही लिया था...ये सभी जानते है कि ये सदभावना मिशन बीजेपी का नही बल्कि गुजरात सरकार का कार्यक्रम था...जहां बीजेपी के सहयोगी दलों की मौजूदगी या गैरमौजूदगी कोई विषय ही नही था...लेकिन यहां मोदी ने जेडीयू को छोडकर एनडीए और उसके बाहर के कई दलों का समर्थन हासिल कर अपनी स्वीकार्यता पर मोहर लगा दी ..2002 के गुजरात दंगों को लेकर मोदी पर जितने आरोप लगे उन्होने उन सभी आरोपों का जवाब गुजरात का विकास करके दे दिया..आज देश की जनता भी अपने अपने राज्यों में गुजरात जैसा विकास देखना चाहती..केन्द्र में एक ऐसे नेता को देखना चाहती है जो विकास के प्रति समर्पित रहे..और उनके इस फ्रेम में नरेन्द्र मोदी से बेहतर कोई तस्वीर नही दिखती..लिहाजा माना जा सकता है कि मोदी का सदभावना मिशन अपने हर मोर्च में बेहद सफल रहा ...और उसने मोदी को न सिर्फ बीजेपी में बल्कि दूसरे दलों के नेताओं से भी काफी आगे खडा कर दिया है..चलते चलते मोदी के उस लाइन का जिक्र कर देता हूं जो आज देश की जनता के मन में भी है कि आज वोट बैंक की राजनीति नही विकास चाहिये...पेट भर रोटी चाहिये...
प्रभात पांडेय
prabhat2412@gmail.com

modi ka Fast

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सदभावना उपवास की घोषणा ने एक नया विषय मीडिया के सामने पेश कर दिया है...कि क्या मोदी के इस उपवास के मूल में प्रधानमंत्री का पद तो नही है.. मोदी के उपवास के खत्म होने के बाद भी ये बहस अब काफी दिनो तक चलती रहेगी या यूं कहें कि 2014 लोक सभी चुनावों तक ये विषय मीडिया को रिझाता रहेगा..जाहिर सी बात बात है कि आज भारत में मीडिया की इतना सशक्त हो चुका है कि वो किसी के चरित्र को बना भी सकता है औप बिगाड सकता है...शायद इस बात मे किसी को संदेह नही होगा कि अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता में मीडिया का रोल काफी अहम रहा था...जितना सत्य ये है कि अन्ना है कि भारत के हर वर्ग का समर्थन अन्ना हजारे को मिला ..उतना ही सत्य ये भी है कि अगर मीडिया सक्रिय नही होती तो शायद ये आंदोलन इतना सफल नही हो सकता था...ये सत्य है कि मोदी के उपवास का समय एक सवाल बन कर सबके जेहन में घूम रहा है कि आखिर मोदी ने इस सदभावना मिशन के लिये ये समय क्यों चुना...लेकिन इसे समझने के लिये हमें थोडा पीछे जाने की जरुरत है...केन्द्र सरकार के द्वारा किये गये घोटालो के लगातार सामने आने से भारतीय जनता में आक्रोश जन्म ले चुका था जो अन्ना हजारे के आंदोलन में अपने चरम पर पहुच गया...भ्रष्टाचार के खिलाफ खडी हो चुकी जनता को अपने कार्यों का लेखा जोखा देने के लिये मोदी के पास इससे अच्छा समय नही था... रही सही कसर अमेरिकी रिपोर्ट ने पूरी कर दी जिसमें मोदी को बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के सबसे बडे दावेदार के रुप में पेश किया गया था..मोदी के समापन भाषण में भी उन्होने इसका जिक्र किया है....गुजरात के मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि उनके द्रारा कराये गये विकास के कार्यों को अभी भी विपक्ष लगातार नकारता जा रहा था..जिसे सामने लाने के लिये एक ऐसे विराट कार्यक्रम की जरुरत थी जो विपक्षियों के कुप्रचार को झुठलाते हुये सत्य को देश के सामने ले आये..हालाकि मोदी के अनशन के लिये सिर्फ अन्ना द्वारा बनाया गया माहौल की काफी नही था...पिछले कुछ दिनों में कई चीजें ऐसी हुयी जो मोदी के पक्ष में गयीं..सुप्रीम कोर्ट का मोदी के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज कराने का आदेश नही देना और मुकदमें को गुजरात की निचली अदालत में वापस भेज देना...इस केस की निगरानी करने से इनकार कर देना.और एसआईटी के रिपोर्ट को आधार बनाकर फैसला सुनाना ये सारी बाते मोदी के लिये राहत देने वाली थीं...ये सत्य है कि गुजरात दंगों को लेकर मोदी के उपर कोई केस नही है..मोदी को डर तब हो सकता था जब सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दे देता...लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ और मोदी पहले से सशक्त हो कर सामने आ गये..कुछ बुद्धिजीवियों ने उनके अनशन को बीजेपी में प्रधानमंत्री पद को लेकर चल रहे अंतरकहल का परिणाम बताया..और कहा कि इस सदभावना मिशन के नाम पर मोदी अपनी दावेदारी की लाइन को दूसरे बीजेपी नेताओं से आगे बढाने का काम कर रहे हैं..ये सही है कि मोदी के इस विराट शक्ति प्रदर्शन ने उनकी दावेदारी को काफी मजबूत कर दिया है...लेकिन उनके बढते कद ने बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस को परेशान कर दिया है...अपने युवराज की ताजपोशी में जुडे कांग्रेसियों के लिये ये तगडा झटका है...जिस तरह कांग्रसियों ने राहुल गांधी को भविष्य के प्रधानमंत्री के रुप में पेश किया और उन्हे एक जिम्मेदार राजनेता की छवि प्रदान करने की कोशिश की जो गरीबों के ये यहां रात बिताता था उनके दुख सुख में शामिल होता था...लेकिन पिछले कुछ दिनों में उनके अपरिपक्व बयानों ने और सोनिय़ा की गैरमौजूदगी में अन्ना के आंदोलन को सही ढंग से नियंत्रित नही कर पाने की असफलता ने उन्हे काफी पीछे कर दिया..इन वजहों ने तेजी से बन रही राहुल गांधी की छवि को काफी नुकसान पहुचा दिया..साथ ही बढती मंहगाई और यूपीए सरकार में सामने आ रहे लगातार घोटालों पर चुप्पी ने भी राहुल की छवि पर विपरीत प्रभाव डाला ...क्यों कि कांग्रेसियों के राहुल चलीसा ने देश की जनता के मन में ये विश्वास पैदा कर दिया था कि राहुल अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर उन्हे राहत दिलायेगें..बहरहाल ऐसा कुछ नही हुआ और प्रधानमंत्री की दौड में मोदी की लकीर आडवानी ,सुषमा स्वराज और जेटली के साथ राहुल गांधी से भी काफी आगे निकल गयी....गुजरात के विकास को सिर्फ सतही मानने वालों को एर और करारा जवाब सयुंक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट से मिली..जिसने गुजरात के कृषि विकास को भारत में सबसे आगे माना..ये उन लोगों के लिये जवाब था जो गुजरात की तरक्की को सिर्फ औद्योगिक विकास मान रहे थे...क्या संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट गुजरात को देश के बाकी राज्यों से आगे नही पहुचा दिया जहां भारत की 70 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है और उनके जीवन यापन का दारोमदार कृषि पर टिका हुआ है... इस सदभावना मिशन ने मोदी की उस छवि को भी काफी विस्तार दिया..जिसको लेकर विरोधी हमेशा सवाल उठाते रहे...वो मानते थे कि देश के दूसरे राजनितिक दलों में मोदी के लिये स्वीकार्यता नही है...लेकिन मंच पर अन्ना द्रमुक और मनसे की मौजूदगी ने एनडीए विस्तार की तरफ एक इशारा कर दिया..गौरतलब है कि इसी अन्ना द्रमुक के समर्थन वापसी से 1998 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार महज 1 वोट से गिर गयी थी और मनसे के विरोध से पिछले लोक सभा और विधान सभा चुनावों में भाजपा शिवसेना को काफी नुकसान उठाना पडा था..हालाकि मोदी के मंच से जनता दल युनाईटेड की गैर नुमाइंदगी का भी सवाल आया...जेडीयू एक श्रेत्रीय पार्टी है और उसका अपना ही जनाधार है...और वो गुजरात में एनडीए का घटक भी नही है ऐसे में उनके न आने को इतनी गंभीरता से लेना सही नही है..क्योंकि ये सत्य भी सर्वविदित है कि जेडीयू ,बीजेपी का गठबंधन काफी पुराना है और ये दल 2002 में भी केन्द्र सरकार में शामिल थी..गुजरात दंगों के बाद भी उसने अपना समर्थन वापस नही लिया था...ये सभी जानते है कि ये सदभावना मिशन बीजेपी का नही बल्कि गुजरात सरकार का कार्यक्रम था...जहां बीजेपी के सहयोगी दलों की मौजूदगी या गैरमौजूदगी कोई विषय ही नही था...लेकिन यहां मोदी ने जेडीयू के छोडकर एनडीए और उसके बाहर के कई दलों का समर्थन हासिल कर अपनी स्वीकार्यता पर मोहर लगा दिया..2002 के गुजरात दंगों को लेकर मोदी पर जितने आरोप लगे उन्होने उन सभी आरोपों का जवाब गुजरात का विकास करके दे दिया..आज देश की जनता भी अपने अपने राज्यों में गुजरात जैसा विकास देखना चाहती..केन्द्र में एक ऐसे नेता को देखना चाहती है जो विकास के प्रति समर्पित रहे..और उनके इस फ्रेम में नरेन्द्र मोदी से बेहतर कोई तस्वीर नही दिखती..लिहाजा माना जा सकता है कि मोदी का सदभावना मिशन अपने हर मोर्च में बेहद सफल रहा ...और उसने मोदी को न सिर्फ बीजेपी में बल्कि दूसरे दलों के नेताओं से भी काफी आगे खडा कर दिया है..चलते चलते मोदी के उस लाइन का जिक्र कर देता हूं जो आज देश की जनता के मन में भी है कि आज वोट बैंक की राजनीति नही विकास चाहिये...पेट भर रोटी चाहिये...
प्रभात पांडेय
prabhat2412@gmail.com

Modi ka Fast